भारतीय खाद्य निगम के विधिक शुल्क बिलों की जांच में 87 में से 48 बिल संदिग्ध, 39 बिलों में भी निर्धारित शुल्क से अधिक भुगतान लेने का आरोप
आजमगढ़। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) से विधिक शुल्क के नाम पर कथित तौर पर फर्जी और कूटरचित बिल प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता विजय कुमार दीक्षित के खिलाफ आजमगढ़ में प्राथमिकी दर्ज की गई है। भारतीय खाद्य निगम के मंडल प्रबंधक बजरंग लाल अग्रवाल की ओर से वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आजमगढ़ को दिए गए प्रार्थना-पत्र के आधार पर 27 अक्टूबर 2026 को मुकदमा दर्ज किए जाने का उल्लेख है। निगम की जांच में अधिवक्ता पर कुल 21,70,586 रुपये का कथित अनधिकृत भुगतान प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। मामले में पुलिस द्वारा संबंधित आपराधिक धाराओं में अभियोग पंजीकृत किया गया है।
भारतीय खाद्य निगम के मंडल प्रबंधक बजरंग लाल अग्रवाल ने अपने प्रार्थना-पत्र में बताया कि भारतीय खाद्य निगम भारत सरकार का निगम है और उसके धन एवं अभिलेख सार्वजनिक धन से संबंधित हैं। निगम विभिन्न न्यायालयों में अपने मुकदमों की पैरवी के लिए निर्धारित शर्तों और शुल्क दरों के आधार पर अधिवक्ताओं को पैनल में सूचीबद्ध करता है। विजय कुमार दीक्षित इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए निगम के सूचीबद्ध अधिवक्ता थे।
प्रार्थना-पत्र के अनुसार, वर्ष 2017 से 2021 के दौरान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत विधिक शुल्क बिलों और उनके आधार पर किए गए भुगतान की जांच माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में दाखिल रिट याचिका संख्या Writ C No. 41735/2024 में 19 मार्च 2025 को पारित आदेश के अनुपालन में निगम के क्षेत्रीय कार्यालय लखनऊ द्वारा की गई।
जांच के दौरान कुल 87 विधिक शुल्क बिलों का परीक्षण किया गया। इसके लिए भारतीय खाद्य निगम के मंडल कार्यालय आजमगढ़ में उपलब्ध अभिलेखों, न्यायालय की वेबसाइट पर मौजूद वादों के विवरण तथा न्यायालय से प्राप्त संबंधित दस्तावेजों की मदद ली गई। जांच में 48 बिल ऐसे पाए जाने का दावा किया गया, जो या तो अस्तित्व में नहीं होने वाले वादों से संबंधित थे अथवा जिनमें संबंधित अधिवक्ता निगम की ओर से पैरवी करने के लिए अधिकृत नहीं थे।
निगम की जांच रिपोर्ट के अनुसार, 48 बिलों के आधार पर कुल 13,94,046 रुपये का भुगतान ऐसा पाया गया, जिसे जांच में कथित धोखाधड़ीपूर्ण तरीके से प्राप्त राशि के रूप में चिह्नित किया गया है। प्रार्थना-पत्र में उदाहरण देते हुए बताया गया है कि Writ A No. 2027/1994, Bhartiya Khadya Nigam Mazdoor Sangh बनाम FCI से संबंधित बिल में अनियमितता सामने आई। निगम के अनुसार, उपलब्ध अभिलेखों में यह वाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से संबंधित था और उसमें निगम की ओर से अधिवक्ता मोहम्मद रजा खान पैरवी कर रहे थे। इसके बावजूद विजय कुमार दीक्षित द्वारा इस मामले के संबंध में बिल प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। इसी तरह Writ A No. 69996/2016, Ashok Kumar Yadav बनाम FCI के संबंध में निगम के अभिलेखों और न्यायालय की वेबसाइट पर संबंधित वाद का विवरण उपलब्ध नहीं मिलने की बात कही गई है। इसके बावजूद उक्त वाद संख्या का उल्लेख कर बिल प्रस्तुत करने और भुगतान प्राप्त करने का आरोप है। इसके अलावा CAPL-3113/2007, CAPL-99/2008, Writ C-61761/2016 तथा अन्य वादों से संबंधित बिलों की जांच में भी अनियमितताएं मिलने का दावा किया गया है। निगम का आरोप है कि कुछ मामलों में अन्य अधिवक्ता उसकी ओर से नियुक्त थे, कुछ वाद दूसरी पीठ से संबंधित थे और कुछ मामलों का पहले ही निस्तारण हो चुका था। इसके बावजूद संबंधित तारीखों के लिए बिल प्रस्तुत किए गए और भुगतान प्राप्त किया गया।
जांच में शेष 39 बिलों को भी परीक्षण के दायरे में रखा गया। निगम के अनुसार, इन मामलों में अधिवक्ता संबंधित वादों में निगम की ओर से नियुक्त थे, लेकिन प्रस्तुत बिलों में निर्धारित विधिक शुल्क दरों से अधिक राशि का दावा किए जाने की बात सामने आई। प्रार्थना-पत्र में आरोप लगाया गया है कि कई बिलों में प्रभावी सुनवाई, विविध प्रार्थना-पत्र, कॉन्फ्रेंस, फाइल निरीक्षण, पेपर बुक तैयार करने, टाइपिंग एवं अन्य विविध खर्च, पूरक शपथपत्र तथा लिखित विधिक राय जैसे मदों के लिए शुल्क मांगा गया। जांच में इन मदों के समर्थन में आवश्यक अभिलेख, कार्य का प्रमाण अथवा निगम की ओर से दिए गए निर्देश उपलब्ध नहीं पाए गए।उदाहरण के तौर पर Writ C No. 65485/2013 और Writ C No. 65340/2013 से संबंधित बिलों में कई मदों के अंतर्गत भुगतान का दावा किए जाने का उल्लेख किया गया है। निगम का कहना है कि संबंधित अभिलेखों की जांच में इन मदों की राशि को अनुमन्य नहीं पाया गया। इसके अलावा कुछ मामलों में जिन तारीखों पर प्रभावी सुनवाई का शुल्क लिया गया, उन तारीखों पर न्यायालय की सूचीबद्धता संबंधी जानकारी के अनुसार मामला सुनवाई के लिए नियत नहीं था अथवा प्रभावी सुनवाई होने का प्रमाण नहीं मिला। निगम की जांच में इन 39 बिलों के संबंध में कुल 7,76,540 रुपये की राशि को निर्धारित शुल्क से अधिक दावा कर प्राप्त की गई राशि बताया गया है। भारतीय खाद्य निगम की ओर से प्रस्तुत शिकायत में दोनों श्रेणियों की राशि का विवरण दिया गया है। इसके अनुसार, 48 बिलों में 13,94,046 रुपये और शेष 39 बिलों में 7,76,540 रुपये की कथित अनियमितता पाई गई। इस प्रकार कुल 87 बिलों के आधार पर **21,70,586 रुपये** के कथित अनधिकृत भुगतान का आरोप लगाया गया है। निगम का कहना है कि इस राशि से उसे वित्तीय क्षति हुई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अनधिकृत भुगतान प्राप्त करने के उद्देश्य से गलत बिल तैयार कर प्रस्तुत किए गए और उनके आधार पर निगम से धनराशि प्राप्त की गई। निगम ने इस पूरे मामले को आपराधिक कृत्य बताते हुए विधिक कार्रवाई की मांग की है। प्रार्थना-पत्र में यह भी कहा गया है कि अधिवक्ता विजय कुमार दीक्षित को अपना पक्ष रखने के लिए कई अवसर दिए गए थे। शिकायत के अनुसार, 15 दिसंबर 2025 को विस्तृत विवरण के साथ जवाब देने का अवसर दिया गया। इसके बाद उनके द्वारा मांगी गई भुगतान संबंधी जानकारी 24 फरवरी 2026 को उपलब्ध कराई गई। निगम के अनुसार, इसके बाद 6 मार्च, 19 मार्च, 10 अप्रैल और 5 मई 2026 को भी उन्हें अपना पक्ष रखने के अवसर दिए गए। अंततः 16 जून 2026 को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए 22 जून 2026 की तारीख निर्धारित की गई, लेकिन शिकायतकर्ता के मुताबिक अधिवक्ता ने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया। निगम के मंडल प्रबंधक ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को दिए गए प्रार्थना-पत्र में आरोपों की जांच कर भारतीय न्याय संहिता के लागू प्रावधानों के तहत कार्रवाई करने की मांग की है। शिकायत में कथित धोखाधड़ी, कूटरचना, कूटरचित दस्तावेजों को वास्तविक बताकर इस्तेमाल करने तथा अन्य संबंधित आपराधिक कृत्यों की जांच कराने का अनुरोध किया गया है। प्रार्थना-पत्र के साथ भारतीय खाद्य निगम का 8 सितंबर 2026 का आदेश, 10 सितंबर 2026 का मांग नोटिस तथा अधिवक्ता को जारी नोटिस और पत्राचार से संबंधित दस्तावेज संलग्न किए जाने का उल्लेख है। इन दस्तावेजों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कर उचित दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है। पुलिस अभिलेख में 27 अक्टूबर 2026 को प्राथमिकी दर्ज किए जाने का उल्लेख है। हालांकि, उपलब्ध शिकायत के आधार पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और मामले में आगे की पुलिस जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। मामले में अधिवक्ता का पक्ष और जांच के बाद सामने आने वाले तथ्य आगे की कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण होंगे।














