रास्ता पूछने के बहाने हुआ था अपहरण, चंबल के बीहड़ में जबरन कराई गई शादी
आज़मगढ़। उम्र महज 12-13 वर्ष, कक्षा पांच की छात्रा और सात भाई-बहनों में छठे नंबर की संतान। सामान्य परिवार और पढ़ाई के बीच अचानक हुई एक घटना ने नीलम गुप्ता की पूरी जिंदगी बदल दी। औरैया जिले के विधूना कस्बे की रहने वाली नीलम का वर्ष 2003 में रास्ता पूछने के बहाने अपहरण कर लिया गया और उन्हें चंबल के बीहड़ों में ले जाया गया। वहां वह कुख्यात डकैत निर्भय सिंह गुर्जर के गिरोह के बीच पहुंच गईं। नीलम के मुताबिक, आंख खुलने पर सामने चंबल का जंगल और खाकी-चितकबरी वर्दी पहने हथियारबंद लोग थे। उन्हें लगा कि पुलिस या सुरक्षा बल ने उन्हें बचा लिया है, लेकिन जल्द ही पता चला कि वह डकैत गिरोह की कैद में हैं। घर पहुंचाने की गुहार लगाने पर उन्हें बताया गया कि गिरोह में आने वाला कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से वापस नहीं जा सकता। इसी दौरान निर्भय सिंह गुर्जर ने खुद को गिरोह का सरगना बताते हुए नीलम को अपनी कैद में होने की बात कही। करीब छह महीने बाद 26 जनवरी 2004 को इटावा के जाहरपुर गांव स्थित मंदिर में नीलम की जबरन शादी करा दी गई। नीलम के अनुसार, इस दौरान उन्हें लगातार भय और दबाव में रखा गया। गिरोह में रहते हुए उन्होंने कई बार भागने की कोशिश की, लेकिन हर बार पकड़ी गईं। मारपीट और मानसिक प्रताड़ना के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। नीलम ने बताया कि बीहड़ में रहते हुए उन्होंने आसपास के गांवों, रास्तों और सड़कों की जानकारी जुटानी शुरू की। उन्होंने गिरोह के कब्जे में रहे दो युवकों को बाहर निकालने का प्रयास भी किया और उन्हें भागने के लिए चाबी तक उपलब्ध कराई, लेकिन वे जंगल से बाहर नहीं निकल सके। गिरोह में महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले व्यवहार तथा मुन्नी और मुन्ना की हत्या जैसी घटनाओं ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसी दौरान उनकी नजदीकी गिरोह के सदस्य और निर्भय सिंह के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले श्याम जाटव से बढ़ी। श्याम को बीहड़ के रास्तों की जानकारी थी, जबकि नीलम बाहर की दुनिया से परिचित थीं। दोनों ने मिलकर गिरोह से निकलने की योजना बनाई। आखिरकार 31 जुलाई 2004 को श्याम के साथ इटावा की एंटी डकैती कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। नीलम के आत्मसमर्पण से निर्भय सिंह गुर्जर बौखला गया। नीलम के अनुसार, उसने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़कर लाने वाले के लिए 21 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। इसके बाद भी नीलम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कानूनी प्रक्रिया का सामना किया। आत्मसमर्पण के बाद नीलम को लंबी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा और करीब 12 वर्ष जेल में रहना पड़ा। इसी दौरान जेलर हर्षिता मिश्रा ने उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया और बेटी की तरह उनका ख्याल रखा। नीलम ने जेल में रहकर कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी की। हर्षिता मिश्रा ने नीलम के मामले से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन किया और परिवार से संपर्क कर उनकी उम्र संबंधी अभिलेख जुटाने का प्रयास किया। बाद में उनके भाई प्रदीप गुप्ता ने स्कूल से संबंधित अभिलेख उपलब्ध कराए, जिन्हें जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इसके आधार पर नीलम को घटना के समय नाबालिग माना गया। वर्ष 2016 में जेल से बाहर आने के बाद नीलम ने परिवार के पास लौटने का प्रयास किया, लेकिन परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं रहीं। कुछ समय बाद वह लखनऊ चली गईं और करीब तीन वर्ष वहां रहीं। उन्होंने कुछ समय राजनीति में भी काम किया और शिवपाल सिंह यादव के साथ जुड़े रहने की बात बताई। इसके बाद एक कंपनी में नौकरी शुरू की और करीब 15 हजार रुपये की आय से अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश की। उनका कहना है कि मेहनत से कमाई करने में उन्हें कभी संकोच नहीं हुआ। बाद में आजमगढ़ के जहानागंज थाना क्षेत्र के सिंहपुर निवासी शिवशंकर सोनी से उनकी मुलाकात हुई। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे रिश्ते में बदल गई और 23 नवंबर 2018 को दोनों ने शादी कर ली। आज नीलम एक बेटी की मां हैं और परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। बीहड़ की दहशत, कैद, हिंसा और वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद नीलम ने अपनी जिंदगी को दोबारा खड़ा किया। उनका कहना है कि अतीत ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया, लेकिन अब वह अपनी जिंदगी को अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहती हैं और वर्तमान जीवन से संतुष्ट हैं। साभार : (Au)














